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Jharkhand Police : कद्दू-कोहड़ा के खोल में बसेरा करेंगे देसी तोते, झारखंड पुलिस के रिटायर कर्मी तंजील बना रहे 500 प्राकृतिक घोंसले

Jharkhand Police : पूर्व में झारखंड पुलिस में कार्यरत रहे तंजील उर रहमान खान ने पक्षियों के संरक्षण और सामाजिक कार्यों के लिए नौकरी छोड़ दी थी। वर्तमान में वे खेती-किसानी के साथ-साथ पर्यावरण और पक्षी संरक्षण के कार्यों में सक्रिय हैं।

by Mujtaba Haider Rizvi
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Ranchi : पक्षियों के संरक्षण के लिए वर्षों से काम कर रहे बिहार के गया जिले के बोधगया प्रखंड अंतर्गत निस्खा गांव निवासी पक्षी प्रेमी तंजील उर रहमान खान ने अब देसी तोतों के संरक्षण की नई मुहिम शुरू की है। गौरैया संरक्षण अभियान में उल्लेखनीय सफलता हासिल करने के बाद तंजील अब तोतों के लिए 500 प्राकृतिक घोंसले तैयार करने के अभियान में जुट गए हैं। इसकी शुरुआत करते हुए उन्होंने अपने घर की दीवारों और आसपास के पेड़ों पर करीब 60 घोंसले टांग दिए हैं।

पूर्व में झारखंड पुलिस में कार्यरत रहे तंजील उर रहमान खान ने पक्षियों के संरक्षण और सामाजिक कार्यों के लिए नौकरी छोड़ दी थी। वर्तमान में वे खेती-किसानी के साथ-साथ पर्यावरण और पक्षी संरक्षण के कार्यों में सक्रिय हैं। उनका कहना है कि उनका उद्देश्य तोतों को पिंजरों से मुक्त कर प्राकृतिक वातावरण में सुरक्षित आश्रय उपलब्ध कराना है।

गौरैया संरक्षण के लिए भी चलाया था अभियान

तंजील बताते हैं कि गौरैया संरक्षण के लिए चलाए गए उनके अभियान का सकारात्मक असर देखने को मिला है। कभी लुप्तप्राय स्थिति में पहुंच चुकी गौरैया अब उनके गांव और आसपास के क्षेत्रों में बड़ी संख्या में दिखाई देती है। इसी प्रेरणा से उन्होंने अब तोतों के संरक्षण का बीड़ा उठाया है।

ऐसे बनाए जा रहे हैं विशेष घोंसले

तोतों के लिए बनाए जा रहे इन विशेष घोंसलों में कद्दू, कोहड़ा (खोलहड़), नारियल के छिलके, लकड़ी, मिट्टी और सीमेंट का उपयोग किया जा रहा है। सबसे पहले बड़े आकार के कद्दू को सुखाकर उसका मजबूत खोल तैयार किया जाता है। इसके बाद उस पर नारियल के सूखे रेशे और घास लपेटी जाती है। फिर पतली लकड़ियों की परत चढ़ाकर सीमेंट का हल्का लेप और अंत में मिट्टी की परत लगाई जाती है। इस प्रक्रिया से घोंसले को प्राकृतिक स्वरूप देने का प्रयास किया जाता है, जिससे तोते उसे अपना सुरक्षित आवास समझ सकें।

गर्मी के मौसम में मिलती रहेगी ठंडक

तंजील के अनुसार, इन घोंसलों की बनावट ऐसी रखी गई है कि गर्मी के मौसम में भी इनके अंदर अपेक्षाकृत ठंडक बनी रहे। उनका दावा है कि यह संरचना प्राकृतिक वातानुकूलित आवास की तरह काम करती है और तोतों के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करती है।

तोतों की पसंद को देखते हुए बनाए जा रहे घोसला

उन्होंने बताया कि तोते सामान्य पक्षियों की तरह टहनियों और घास के खुले घोंसलों में नहीं रहते, बल्कि पेड़ों के तनों में बने प्राकृतिक खोखलों को अधिक पसंद करते हैं। इसी व्यवहार को ध्यान में रखते हुए खोलहड़ आधारित घोंसलों को डिजाइन किया गया है। तंजील को उम्मीद है कि उनके इस प्रयास से बड़ी संख्या में देसी तोतों को सुरक्षित आश्रय मिलेगा और लोगों में पक्षी संरक्षण के प्रति जागरूकता भी बढ़ेगी।

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