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Chaibasa News : चाईबासा में प्रसूता की मौत मामले में नर्सिंग होम संचालक डॉक्टर दोषी, देना होगा 11 लाख रुपये मुआवजा 

जिला उपभोक्ता फोरम के तीन सदस्यीय बेंच में 2-1 से सुनाया फैसला, 45 दिन के अंदर करना होगा मुआवजे का भुगतान

by Rajeshwar Pandey
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चाईबासा: प्रसूता की मौत से जुड़े चिकित्सकीय लापरवाही के एक गंभीर मामले में जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, चाईबासा ने 2-1 के बहुमत से फैसला सुनाया है। आयोग ने आशा नर्सिंग होम के संचालक एवं जनरल सर्जन डॉ. अरुण कुमार को सेवा में कमी का जिम्मेदार मानते हुए 10 लाख रुपये मुआवजा और 1 लाख रुपये केस खर्च देने का आदेश दिया है। कुल 11 लाख रुपये 45 दिनों के भीतर भुगतान करने होंगे। तय समय में भुगतान न करने पर 12% वार्षिक ब्याज देना होगा।

क्या है पूरा मामला

ओडिशा के मयूरभंज जिले के देवगाम निवासी सत्य नारायण बोयपाई ने आयोग में शिकायत दायर की थी। उनका आरोप था कि 11 जून 2024 को प्रसव पीड़ा होने पर पत्नी सुनीता देवगम को चाईबासा के आशा नर्सिंग होम में भर्ती कराया गया था। शिकायतकर्ता ने कहा कि बिना किसी महिला रोग विशेषज्ञ, प्रशिक्षित नर्स और तय मानकों के ऑपरेशन किया गया। इसके बाद अत्यधिक रक्तस्राव होने लगा। हालत बिगड़ने पर पहले टीएमएच, जमशेदपुर और फिर रिम्स, रांची रेफर किया गया, जहां इलाज के दौरान 17 जून 2024 को सुनीता की मौत हो गई।

डॉक्टर ने लापरवाही से किया इनकार

डॉ. अरुण कुमार ने सभी आरोपों को गलत बताया। उन्होंने कहा कि मरीज को भर्ती के समय ही ‘प्लेसेंटल एब्रप्शन’ जैसी गंभीर जटिलता थी। स्थिति को देखते हुए आपातकालीन सर्जरी की गई, जो सफल रहा और स्वस्थ बच्चे का जन्म हुआ।

डॉक्टर का कहना था कि बाद में मरीज की मौत सेप्टिक शॉक, मल्टी ऑर्गन फेल्योर और डीआईसी जैसी जटिलताओं के कारण हुई, न कि किसी लापरवाही से।

बहुमत का फैसला: मानकों का पालन नहीं हुआ

आयोग के अध्यक्ष और महिला सदस्य ने माना कि शिकायतकर्ता स्वतंत्र विशेषज्ञ रिपोर्ट नहीं दे सका, लेकिन मौखिक गवाही, दस्तावेज और परिस्थितियों से स्पष्ट है कि इलाज के दौरान जरूरी प्रोटोकॉल का पालन नहीं हुआ। इसे सेवा में कमी मानते हुए दोनों ने मुआवजे का आदेश दिया।

असहमति: लापरवाही साबित नहीं

वहीं आयोग के पुरुष सदस्य ने अलग राय रखी। उन्होंने कहा कि सिर्फ ऑपरेशन के बाद मौत होने से डॉक्टर को दोषी नहीं माना जा सकता। सिविल सर्जन की रिपोर्ट और रिम्स की राय में लापरवाही का जिक्र नहीं है। टीएमएच या रिम्स के डॉक्टर को गवाह भी नहीं बनाया गया। इस आधार पर उन्होंने 25.40 लाख रुपये के दावे को खारिज कर दिया। आयोग के नियमों के अनुसार बहुमत का निर्णय ही मान्य होगा। लिहाजा डॉ. अरुण कुमार को 11 लाख रुपये देने का आदेश अब प्रभावी रहेगा।

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