
पलामू : कहते हैं इंसान इस दुनिया से खाली हाथ जाता है, लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जो मौत के बाद भी समाज को बहुत कुछ दे जाते हैं। पलामू के हुसैनाबाद के दमदमी गांव निवासी 70 वर्षीय जुझारू समाजसेवी रामकेश्वर मेहता ने भी कुछ ऐसा ही कर दिखाया। रविवार को दुनिया से रुखसत होने के बाद भी उनका सफर खत्म नहीं हुआ है। अपनी अंतिम ख्वाहिश के मुताबिक, उनका पार्थिव शरीर रांची के RIMS अस्पताल के एनाटॉमी विभाग को सौंप दिया गया है, ताकि मेडिकल छात्र उस पर पढ़ाई और रिसर्च कर सकें।
500 दिनों की लड़ाई से बचाई थी सोहेया पहाड़ी
रामकेश्वर सिर्फ बातों के समाजसेवी नहीं थे, बल्कि जमीन पर उतरकर लड़ने वाले योद्धा थे। ‘सोहेया पहाड़ बचाओ संघर्ष मोर्चा’ के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने अवैध खनन के खिलाफ बड़ा मोर्चा खोला था। प्रकृति और गांव के हक के लिए वे 500 से ज्यादा दिनों तक लगातार धरने पर बैठे रहे। इतना ही नहीं, इस अवैध कारोबार को बंद कराने के लिए उन्होंने हाईकोर्ट तक कानूनी जंग लड़ी, जो आज भी जारी है।
परिजनों ने पूरी की आखिरी इच्छा
5 मार्च 1956 को जन्मे रामकेश्वर ने अपनी जिंदगी में ही एग्रीमेंट बनाकर देहदान का संकल्प लिया था। जैसे ही उनके निधन की खबर आई, पूरे इलाके में शोक की लहर दौड़ गई। दुखों के पहाड़ के बीच भी उनके परिवार ने उनकी वसीयत का सम्मान किया और शव को रिम्स भेजने की तैयारी पूरी की।
उनके इस संकल्प पर कई बुद्धिजीवियों ने कहा -आमतौर पर मौत के बाद शरीर पंचतत्व में विलीन हो जाता है, लेकिन रामकेश्वर मेहता का यह फैसला दिखाता है कि अगर नियत साफ हो तो इंसान अपने जाने के बाद भी किसी के काम आ सकता है। उनका यह कदम आने वाली पीढ़ियों को हमेशा संदेश देता रहेगा कि असली जिंदगी वही है जो दूसरों के काम आए।
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