Jamshedpur : 18 जिलहिज्जा यानी 5 जून को शिया समुदाय ईद-ए-गदीर का पर्व मनाएगा। नए कपड़े पहने जाएंगे। घरों में अच्छे पकवान बनेंगे। इसके अलावा, मस्जिद में खास इबादत होगी। यह त्यौहार इस्लाम के खलीफा और इमाम हजरत अली अलैहिस्सलाम की हज़रत मुहम्मद मुस्तफा सल्ललाहो अलैहे व आलेही वसल्लम के उत्तराधिकारी के तौर पर ताजपोशी के मौके पर मनाया जाता है।
इस त्योहार की शुरुआत गुरुवार की रात से हो गई है। इस्लामिक नियमों के अनुसार शाम को मगरिब की अजान के बाद से ही अगली तारीख मान ली जाती है। गुरुवार को जमशेदपुर की शिया जामा मस्जिद में महफिल का आयोजन हुआ।। यहां स्थानीय शायरों ने हजरत अली अलैहिस्सलाम की शान में कसीदे पढ़े। रांची में भी मस्जिद में कसीदाख्वानी का आयोजन किया गया। यहां शिया जामा मस्जिद के पेश इमाम मौलाना तहजीबुल हसन की कयादत में प्रोग्राम संपन्न हुआ।
आज के दिन क्या हुआ था
तारीख में है कि 18 जिलहिज्जा को ही पैगंबर हजरत मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम ने सऊदी अरब के गदीर ए खुम नामक स्थान पर खुतबा दिया था और इसी दौरान हजरत अली अलैहिस्सलाम का हाथ बुलंद कर ऐलान किया था कि जिसके जिसके वह मौला हैं उसके यह हजरत अली भी मौला हैं। इसी दिन हजरत अली अलैहिस्सलाम की इमामत व उनके उत्तराधिकारी होने का भी ऐलान हुआ था। इस दिन को शिया समुदाय ईद के तौर पर मनाता है। शिया समुदाय के नजदीक यह सबसे बड़ी ईद मानी जाती है।
ईद के दिन क्या हैं विशेष इबादतें
मानगो के जवाहर नगर के रहने वाले इफ्तेखार अली का कहना है कि ईद के दिन गुस्ल करने का खूब सवाब है। दोपहर की नमाज से कुछ देर पहले गुस्ल करें और फिर दो रकअत नमाज़ पढ़ें। नमाज के दौरान सूराए हम्द पढ़ने के बाद सूरा ए तौहीद 10 बार और आयतल कुर्सी 10 बार पढ़ें। सूरह कद्र 10 बार पढ़ी जाएगी। इसके बाद सलवात भेजें। इस दिन अल्लाह की बारगाह में अस्तगफार करने से सारे गुनाह माफ हो जाते हैं। इस दिन गरीबों की मदद करने का भी काफी सवाब है। इस दिन किए गए नए आमाल का हजार गुना सवाब मिलता है। ईद-ए-गदीर का पर्व भारत के अलावा बांग्लादेश, ईरान, इराक, यमन, अफगानिस्तान, सऊदी अरब, बहरीन, लेबनान, सीरिया तुरकिए आदि सभी इस्लामी देशों में मनाया जाता है।
ईद-ए-एअकबर
ईरान में ईद-ए- गदीर को ईद-ए-अकबर भी कहते हैं। यह ईद धूमधाम से बनाई जाती है। शहरों में सजावट और रोशनी की जाती है। लोगों के बीच मिठाइयां बांटी जाती हैं। मस्जिदों में विशेष आमाल किए जाते हैं। दुआएं नुतबा खास तौर से पढ़ी जाती है। लोग एक दूसरे से मिलकर उन्हें तोहफे देते हैं।

