Home » यात्रा वृतांत : मेडिकेरी : घुमावदार रास्तों में बसी खूबसूरत यात्रा

यात्रा वृतांत : मेडिकेरी : घुमावदार रास्तों में बसी खूबसूरत यात्रा

दैनिक समाचार पत्र द फोटोन न्यूज के साहित्य पेज के लिए लिखे गए कॉलम : घुमक्कड़ की पाती से साभार

by Sanjaya Shepherd
यात्रा वृतांत
WhatsApp Group Join Now
Instagram Follow Now

कुछ यात्राएं मंज़िल तक पहुंचने के लिए नहीं होतीं, वे भीतर के किसी अनदेखे भूगोल तक पहुंचने के लिए होती हैं। दिल्ली से कर्नाटक के पश्चिमी घाटों में बसे मेडिकेरी की मेरी यात्रा भी ऐसी ही थी। यह केवल उत्तर भारत के महानगर से दक्षिण भारत के हरित पर्वतों तक की दूरी तय करने का प्रसंग नहीं था, बल्कि दो संस्कृतियों, दो जलवायु और दो जीवन-दृष्टियों के बीच पुल बन जाने का अनुभव था।

दिल्ली की सुबह हमेशा की तरह जल्दी जाग चुकी थी। सड़कें अपने शोर में व्यस्त थीं, मेट्रो अपनी गति में थी और हवा में महानगर की वही परिचित बेचैनी तैर रही थी। स्टेशन की ओर बढ़ते हुए लगा कि शहर मुझे रोकना नहीं चाहता; जैसे वह जानता हो कि यात्राएं लौटकर आने वालों को पहले से थोड़ा अलग बना देती हैं। प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ी ट्रेन केवल लोहे के डिब्बों का समूह नहीं थी, वह अनेक सपनों, प्रतीक्षाओं और कहानियों का चलता-फिरता संसार थी।

ट्रेन धीरे-धीरे दिल्ली से बाहर निकली तो ऊंची इमारतों का सिलसिला खेतों में बदलने लगा। उत्तर भारत की धरती अपने विस्तार के साथ खिड़की के बाहर फैलती चली गई। कहीं सरसों के खेतों की स्मृतियां थीं, कहीं धान के छोटे-छोटे टुकड़े, कहीं नहरों का शांत जल और कहीं गांवों के बीच खड़े पुराने पीपल। हर स्टेशन अपने साथ एक अलग बोली, अलग चेहरा और अलग स्वाद लेकर आता। चाय बेचने वालों की आवाज़ें भी प्रदेश बदलते-बदलते अपना लहजा बदल देतीं। लगता था कि भाषा बदल रही है, पर आतिथ्य का भाव वही है।

Read Also-यात्रा वृतांत : कौसानी : भारत का स्विट्जरलैंड

यात्रा का सबसे सुंदर पक्ष यही होता है कि वह बताती है-भारत को नक्शे पर नहीं, खिड़की के बाहर बहते दृश्यों में पढ़ा जा सकता है। एक ही देश में मिट्टी का रंग बदलता है, पेड़ों की आकृतियां बदलती हैं, घरों की बनावट बदलती है और लोगों की वेशभूषा भी। पर मुस्कान का अर्थ हर जगह एक-सा रहता है।

जैसे-जैसे दक्षिण की ओर बढ़ता गया, मौसम का मिज़ाज भी बदलने लगा। हवा में नमी घुलने लगी थी। खिड़की के बाहर नारियल और केले के पेड़ों की संख्या बढ़ गई। लाल मिट्टी दिखाई देने लगी। रेलवे स्टेशनों के नाम अब कन्नड़ और अंग्रेज़ी में लिखे दिखते थे। मुझे महसूस हुआ कि मैं केवल भूगोल नहीं बदल रहा, बल्कि भारत के एक नए सांस्कृतिक अध्याय में प्रवेश कर रहा हूं।

Read Also-यात्रा वृतांत : रानीखेत : हिमालय की वादियों में सुकून की तलाश

बेंगलुरु पहुंचने तक यात्रा ने शरीर को थका दिया था, पर मन अब भी उत्सुक था। महानगर की तेज़ रफ़्तार से निकलकर जब मेडिकेरी जाने वाली सड़क पर कदम रखा तो दृश्य अचानक बदलने लगे। चौड़ी सड़कों के दोनों ओर फैली हरियाली, दूर-दूर तक उठती पहाड़ियां और बादलों के झुंड किसी चित्रकार की कल्पना जैसे लग रहे थे। शहर पीछे छूट चुका था और प्रकृति धीरे-धीरे अपना अधिकार जमा रही थी।

Read Also- यात्रा वृतांत :  स्मृतियों में बसा गुशैणी गांव

मेडिकेरी की ओर जाने वाला घुमावदार रास्ता मानो हर मोड़ पर एक नया दृश्य उपहार में देता था। कहीं कॉफ़ी के विस्तृत बागान थे, कहीं काली मिर्च की बेलें ऊंचे वृक्षों से लिपटी थीं। हवा में कॉफ़ी के फूलों की हल्की सुगंध घुली हुई थी। बीच-बीच में मसालों की महक यह याद दिलाती थी कि कूर्ग केवल पहाड़ों का प्रदेश नहीं, बल्कि सुगंधों की भी एक अनोखी दुनिया है।

Read Also-यात्रा वृतांत : इतिहास, शौर्य व समय की धड़कन

पहाड़ियों पर उतरते बादलों को देखकर ऐसा लगता था, जैसे आकाश स्वयं धरती से मिलने चला आया हो। कहीं हल्की बारिश की बूंदें शीशे पर दस्तक देतीं, कहीं धूप बादलों के बीच से निकलकर घाटियों पर सुनहरी चादर बिछा देती। प्रकृति यहां किसी एक रंग में नहीं रहती; वह हर क्षण अपना नया रूप रचती है।

मेडिकेरी पहुंचते ही सबसे पहले जो चीज़ महसूस हुई, वह थी वहां की शांति। यह शांति केवल आवाज़ों की अनुपस्थिति नहीं थी, बल्कि जीवन की एक अलग लय थी। यहां समय घड़ी की सुइयों से नहीं, बादलों की चाल और बारिश की बूंदों से चलता हुआ प्रतीत होता है। दूर तक फैले कॉफ़ी एस्टेट, लाल छतों वाले घर और धुंध में लिपटी पहाड़ियां मन को अनायास ही धीमा कर देती हैं।

Read Also-यात्रा वृतांत : कोल्ली हिल्स : पहाड़ सिखाते संस्कृति का नया अर्थ

राजा की सीट से घाटियों को निहारते हुए लगा कि प्रकृति ने यहां उदारता की सारी सीमाएं पार कर दी हैं। सामने फैली हरियाली में दूर तक बादलों की परतें तैर रही थीं। डूबते सूरज की किरणें जब उन बादलों पर पड़तीं, तो पूरा दृश्य किसी स्वप्न जैसा प्रतीत होता। उस क्षण यह समझ में आया कि कुछ दृश्य कैमरे में नहीं, केवल स्मृतियों में ही सुरक्षित रह सकते हैं।

एबी फ़ॉल्स का जलप्रपात अपने पूरे वेग से चट्टानों पर गिरता हुआ जीवन का संगीत रच रहा था। पानी की गूंज इतनी प्रबल थी कि उसके सामने मन के भीतर का सारा शोर स्वतः शांत हो गया। वहीं दुबारे एलीफ़ेंट कैंप के आसपास बहती कावेरी नदी का सौम्य रूप बिल्कुल अलग अनुभूति देता है। यही नदी आगे चलकर दक्षिण भारत की जीवनरेखा बनती है। उसके शांत प्रवाह को देखकर लगा कि महान यात्राएं हमेशा शोर के साथ नहीं होतीं; कई बार वे बिल्कुल निस्संग और मौन भी होती हैं।

Read Also-यात्रा वृतांत : हिमाचल का गांव, जहां पहाड़ साझा करते मौन

कूर्ग के लोगों से मिलना भी इस यात्रा का एक महत्वपूर्ण अनुभव था। उनकी सादगी, विनम्रता और प्रकृति के प्रति सम्मान ने प्रभावित किया। मेडिकेरी में ठहरने का अनुभव भी इस यात्रा की खूबसूरत यादों में शामिल रहा। कॉफ़ी के बागानों के बीच बने होमस्टे आधुनिक सुविधाओं के साथ प्रकृति का सान्निध्य भी देते हैं। सुबह खिड़की खोलते ही धुंध से ढकी पहाड़ियां और पक्षियों का मधुर कलरव दिन की शुरुआत को यादगार बना देते हैं। भोजन में स्थानीय स्वाद की अलग ही पहचान है। ताज़ी फ़िल्टर कॉफ़ी की सुगंध, पांडी करी, कदंबुट्टू, अक्की रोटी और मसालों से भरपूर पारंपरिक व्यंजन इस क्षेत्र की समृद्ध पाक-संस्कृति से परिचित कराते हैं। यहां का हर निवाला मानो कूर्ग की मिट्टी, बारिश और हरियाली का स्वाद अपने भीतर समेटे हुए है।

Read Also-यात्रा वृतांत : अमरनाथ, जहां यात्रा बन जाती तीर्थ

वापसी की तैयारी करते समय महसूस हुआ कि हर यात्रा अपने साथ कुछ न कुछ छोड़ जाती है और कुछ नया साथ ले भी जाती है। मेडिकेरी ने मुझे यह सिखाया कि प्रकृति को देखने और उसे महसूस करने में बहुत अंतर है। पहाड़ केवल ऊंचाई नहीं होते, वे धैर्य का पाठ पढ़ाते हैं। बारिश केवल मौसम नहीं होती, वह स्मृतियों को धोकर नया बना देने वाली अनुभूति भी होती है। और यात्राएं केवल स्थान परिवर्तन नहीं होतीं, वे मन के भीतर छिपे यात्री को पहचानने का अवसर भी देती हैं।

Read ALso- यात्रा वृतांत : नीलगिरि की वादियों में बिताए कुछ खूबसूरत पल

दिल्ली लौटते समय मेरे बैग में कुछ कॉफ़ी के पैकेट, कुछ तस्वीरें और कुछ स्मृति-चिह्न अवश्य थे, लेकिन सबसे मूल्यवान वस्तु वह शांति थी जो मेडिकेरी की पहाड़ियों ने मेरे भीतर रख दी थी। आज भी जब किसी कप से ताज़ी कॉफ़ी की सुगंध उठती है, मुझे लगता है कि पश्चिमी घाट की धुंध फिर से मेरे आसपास उतर आई है और मैं एक बार फिर उन घुमावदार रास्तों पर हूं, जहां हर मोड़ यह कहता था—यात्रा कभी समाप्त नहीं होती, वह केवल अगली स्मृति में बदल जाती है।

Read Also-यात्रा वृतांत : स्मृतियों में बस गई नागालैंड की दजुकू वैली

Related Articles

Leave a Comment