
दिल्ली की गर्मी, धूल और हॉर्न से भरी शामों में हिमालय का खयाल अक्सर एक तस्वीर की तरह आता है- बर्फ से ढंकी चोटियाँ, देवदार के जंगल और बादलों में खोई कोई पगडंडी। लेकिन, कुछ यात्राएँ तस्वीर नहीं होतीं। वे धीरे-धीरे मन के भीतर उतरती हैं और लौट आने के बाद भी वहीं चलती रहती हैं। मियार वैली की यात्रा मेरे लिए ऐसी ही एक यात्रा थी।

लाहौल की मियार घाटी मियार नदी के साथ भीतर की ओर खुलती हुई एक लंबी, दूरस्थ हिमालयी घाटी है। दिल्ली से इस यात्रा की शुरुआत करते हुए मन में उत्साह तो था, लेकिन यह अंदाज़ा नहीं था कि आने वाले दिनों में रास्ता केवल दिल्ली से हिमाचल तक नहीं, बल्कि मेरे अपने भीतर तक जाने वाला है।
रात में दिल्ली से बस चली तो शहर अपनी पूरी बेचैनी के साथ हमारे साथ था। खिड़की के बाहर पहले रोशनियों का समुद्र था, फिर धीरे-धीरे वह विरल होता गया। रात गहरी हुई और सड़क पर दौड़ती बस की खिड़की में मेरा चेहरा दिखाई देने लगा। शायद यात्रा हमेशा यहीं से शुरू होती है- जब बाहर का दृश्य अँधेरे में खो जाता है और भीतर का दृश्य दिखाई देने लगता है। सुबह तक मैदान बदल चुके थे। पंजाब और हरियाणा के खेत पीछे छूटे और पहाड़ शुरू हो गए। सड़क अब सीधी रेखा नहीं रही थी। वह पहाड़ों के शरीर पर खिंची हुई एक बेचैन लकीर थी—कहीं ऊपर चढ़ती, कहीं नदी के साथ नीचे उतरती। मनाली पहुँचा तो लगा जैसे यात्रा का पहला अध्याय पूरा हुआ, लेकिन असली कहानी अभी बाकी थी।
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अगली सुबह हम मनाली से लाहौल की ओर निकले। अटल टनल में प्रवेश करते ही जैसे दुनिया ने अपना रंग बदलना शुरू कर दिया। एक तरफ मनाली की हरियाली थी- घने जंगल, नम हवा और पहाड़ों पर बिखरे बादल। सुरंग से बाहर निकले तो दृश्य अचानक अधिक कठोर हो गया। हरे पहाड़ों की जगह भूरे और धूसर पहाड़ सामने थे। पेड़ कम होते गए। चट्टानें अधिक दिखाई देने लगीं। हवा में नमी घटकर एक पारदर्शी ठंडक में बदल गई। यही लाहौल था। सड़क आगे बढ़ती रही। चंद्रा और भागा नदियों की घाटियों को पीछे छोड़ते हुए हम उदयपुर की ओर बढ़े और वहाँ से मियार की दिशा में मुड़ गए। रास्ता जैसे-जैसे भीतर जाता गया, दुनिया का शोर पीछे छूटता गया। सड़क संकरी होती गई, पहाड़ ऊँचे होते गए और आकाश बड़ा।
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शुक्टो और खानजर की ओर बढ़ते हुए ऐसा लग रहा था जैसे हम धीरे-धीरे किसी पुराने हिमालयी आख्यान में प्रवेश कर रहे हों। छोटे-छोटे गाँव, पत्थर और मिट्टी से बने घर, खेतों में काम करते लोग और दूर पहाड़ों पर टिकी हुई बर्फ की सफेद धारियाँ- सब कुछ अपनी जगह इतना सहज था कि शहर की कृत्रिम गति अचानक बहुत दूर की चीज लगने लगी। खानजर के आगे सड़क समाप्त हो गई। अब आगे केवल पगडंडी थी। पीठ पर बैग था। सामने पहाड़ थे। नीचे मियार नदी बह रही थी और बीच में वह पगडंडी थी, जो हमें घाटी के भीतर ले जाने वाली थी।
पहला कदम रखते ही यात्रा का अर्थ बदल गया। अब कोई वाहन नहीं था, कोई हॉर्न नहीं था, कोई जल्दी नहीं थी। केवल अपने पैरों की गति थी और सामने खुलता हुआ हिमालय। कुछ देर तक खेत हमारे साथ चलते रहे। आलू और मटर के छोटे-छोटे खेत पीछे छूटे और फिर गाँव की आखिरी छत भी दिखाई देना बंद हो गई। अचानक घाटी फैल गई। इतनी फैल गई कि मनुष्य अपने आप छोटा लगने लगा। चारों ओर घास के विशाल मैदान थे। कहीं छोटे-छोटे जंगली फूल खिले थे, कहीं पत्थरों के बीच से पतली धाराएँ निकल रही थीं। दूर बर्फ से ढंकी चोटियाँ थीं और उनके ऊपर आकाश का ऐसा विस्तार था कि दिल्ली के आसमान की याद थोड़ी हास्यास्पद लगने लगी।
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शाम को हमारा शिविर एक खुले घास के मैदान में लगा। सूरज पहाड़ों के पीछे उतर चुका था और तापमान तेजी से गिर रहा था। टेंट के बाहर बैठकर मैंने पहली बार मियार की रात को पूरी तरह महसूस किया। आकाश तारों से भरा था। इतने तारे कि लगा, शहरों में हमने रात को भी आधा-अधूरा ही देखा है। अगली सुबह नदी की आवाज से आँख खुली। हिमालय में सुबह कभी पूरी तरह चुप नहीं होती। कहीं नदी बोलती है, कहीं हवा चट्टानों से टकराती है, कहीं दूर किसी पक्षी की आवाज आती है। मियार नदी हमारी यात्रा की सबसे स्थायी साथी थी। उसका पानी बर्फ जैसा ठंडा और बेहद तेज था। वह चट्टानों के बीच से ऐसे गुजरती थी जैसे उसे किसी मंजिल की जल्दी हो।
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हम उसके साथ-साथ ऊपर की ओर बढ़ते रहे। रास्ता कभी मुलायम घास के मैदानों से गुजरता, कभी बड़े-बड़े पत्थरों के बीच से। कई जगह छोटी धाराएँ रास्ता काटतीं और हमें अपने जूते बचाकर या पत्थरों पर संतुलन बनाकर उन्हें पार करना पड़ता। मियार घाटी की खूबसूरती उसकी ऊँची चोटियों में जितनी है, उससे कहीं अधिक उसके खुलेपन में है। यहाँ पहाड़ सामने खड़े होकर रास्ता नहीं रोकते। वे चारों ओर से आपको घेरे रहते हैं और बीच में विशाल चरागाह एक खुली साँस की तरह फैले रहते हैं।
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चलते-चलते कई बार मैं पीछे मुड़कर देखता। जिस रास्ते से हम आए थे वह धीरे-धीरे अदृश्य होता जाता। सामने केवल नई घाटी खुलती रहती। शायद पहाड़ों में आगे बढ़ने का यही अर्थ है—पीछे की दुनिया को धीरे-धीरे आँखों से ओझल होते देखना। एक जगह रास्ते के किनारे एक छोटा-सा चोर्टेन दिखाई दिया। उसके आसपास हवा में प्रार्थना-ध्वज फड़फड़ा रहे थे। नीला, पीला, लाल, हरा और सफेद रंग आसमान की पृष्ठभूमि में चमक रहे थे। हवा जब उन्हें हिलाती तो लगता जैसे वे किसी अदृश्य शक्ति से संवाद कर रहे हों। हम कुछ देर वहीं बैठ गए।
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नीचे मियार नदी बह रही थी। ऊपर बादल पहाड़ों को छू रहे थे और बीच में हम कुछ यात्री थे- बहुत छोटे, बहुत शांत और शायद अपने रोजमर्रा के जीवन से पहली बार इतने दूर। मियार की यात्रा का एक बड़ा आकर्षण उसके विशाल अल्पाइन चरागाह हैं। गर्मियों और मानसून के महीनों में ये मैदान जंगली फूलों से भर जाते हैं। हरे रंग की अनगिनत छायाओं के बीच छोटे-छोटे फूल ऐसे दिखाई देते हैं जैसे किसी चित्रकार ने बहुत धैर्य से एक विशाल कैनवास पर रंग रखे हों।
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मैं एक छोटे से फूल के सामने बैठ गया। शहर में हम फूलों को सजावट समझते हैं। यहाँ फूल जीवन का हिस्सा थे। उन्हें कोई देखने वाला हो या न हो, वे खिल रहे थे। कोई उनका नाम जानता हो या नहीं, वे अपनी ऋतु पूरी कर रहे थे। शायद मनुष्य को भी ऐसा ही होना चाहिए- अपनी ऋतु में पूरी तरह खिलना, बिना किसी तालियों की प्रतीक्षा किए।
जैसे-जैसे हम घाटी में ऊपर बढ़ते गए, पहाड़ों का रूप बदलता गया। हरी ढलानों की जगह चट्टानी विस्तार बढ़ने लगा। दूर बर्फ की पुरानी धारियाँ दिखाई देने लगीं। हवा अधिक ठंडी और तीखी हो गई। मियार ग्लेशियर की ओर बढ़ते हुए रास्ता कठिन होने लगा। अब हर कदम सोचकर रखना पड़ता था। कहीं ढीले पत्थर थे, कहीं बर्फीला पानी और कहीं चट्टानों का असमतल विस्तार। शरीर थक रहा था, लेकिन आँखें लगातार नए दृश्य खोज रही थीं।दूर बर्फ की विशाल दुनिया दिखाई देने लगी।
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हम जितना आगे बढ़ते, उतना ही लगता कि हम किसी साधारण घाटी में नहीं, बल्कि हिमालय के किसी गुप्त कक्ष में प्रवेश कर रहे हैं। चारों तरफ चोटियाँ थीं और उनके बीच बर्फ की विशाल संरचनाएँ। मियार ग्लेशियर का संसार मनुष्य की कल्पना से कहीं बड़ा था। उस क्षण मेरे भीतर एक अजीब-सी शांति उतर आई। मैंने सोचा, पर्वत की महानता शायद उसकी ऊँचाई में नहीं होती। उसकी महानता इस बात में होती है कि उसके सामने खड़े होकर मनुष्य अपने अहंकार की ऊँचाई भूल जाता है।
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उस रात मैं काफी देर तक टेंट से बाहर बैठा रहा। हवा तेज थी। दूर कहीं पानी बह रहा था। ऊपर आकाश में तारे चमक रहे थे। मैंने महसूस किया कि अंधेरा हमेशा डरावना नहीं होता। कभी-कभी अंधेरा ही वह जगह है जहाँ प्रकाश सबसे साफ दिखाई देता है। अगली सुबह जब हम लौटने लगे तो वही रास्ता अब कुछ परिचित लग रहा था। लेकिन पहाड़ों में कोई दृश्य कभी पूरी तरह पुराना नहीं होता। सुबह की रोशनी बदलते ही वही पहाड़ अलग रंग ले लेते हैं। बादल बदलते हैं तो घाटी का चेहरा बदल जाता है। नदी हर मोड़ पर अलग दिखाई देती है। हम फिर उन्हीं चरागाहों से गुजरे। वही चोर्टेन आया। वही प्रार्थना-ध्वज हवा में फड़फड़ाते मिले। कहीं दूर चरवाहों की घंटियों की आवाज सुनाई दी। वह आवाज इतनी सरल थी कि मन उसे पकड़कर बहुत दूर तक चला जाता था। धीरे-धीरे खानजर दिखाई देने लगा।
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कुछ दिन पहले जिस गाँव को पीछे छोड़ते हुए हम आगे बढ़े थे, अब वही गाँव किसी अपने घर की तरह लग रहा था। शायद यात्रा का सबसे सुंदर रहस्य यही है कि जगहें तब अपनी लगती हैं जब हम उनमें अपना कुछ छोड़ आते हैं। खानजर पहुँचकर जब फिर सड़क मिली और गाड़ी में बैठे, तो पैरों को पहली बार चलने की जरूरत नहीं थी। मोबाइल में नेटवर्क वापस आ गया। फोन पर संदेश आने लगे। दुनिया फिर से हमारे सामने थी।लेकिन हमारे भीतर कुछ बदल चुका था। वापसी का रास्ता वही था। उदयपुर, तांदी, लाहौल, अटल टनल, मनाली और फिर मैदान। फिर वही दिल्ली। वही ट्रैफिक। वही हॉर्न। वही भागती हुई जिंदगी। लेकिन दिल्ली लौटकर वह शहर पहले जैसा नहीं लगा।
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क्योंकि अब मुझे पता था कि इसी देश में एक ऐसी घाटी भी है जहाँ कई घंटों तक कोई हॉर्न सुनाई नहीं देता। जहाँ सुबह नदी की आवाज से होती है। जहाँ शाम का अर्थ सूर्यास्त होता है, स्क्रीन पर बदलती हुई रोशनी नहीं। जहाँ रात सचमुच रात होती है और जहाँ आकाश को देखने के लिए किसी ऐप की जरूरत नहीं पड़ती।
मियार ने मुझे केवल ग्लेशियर, पहाड़, नदी और चरागाह नहीं दिए। उसने मेरी दृष्टि थोड़ी बदल दी। उसने सिखाया कि रास्ता हमेशा मंजिल तक नहीं ले जाता। कभी-कभी रास्ता हमें हम तक ले जाता है। दिल्ली से निकला था तो मेरे पास एक पता था। मियार से लौटा तो मेरे भीतर एक घाटी थी। एक नदी थी। कुछ बर्फीली चोटियाँ थीं। घास पर झुके छोटे-छोटे फूल थे। रात के अनगिनत तारे थे और एक पगडंडी थी, जो शायद आज भी वहीं है। किसी अगले यात्री के कदमों की प्रतीक्षा करती हुई। मियार वैली में। हिमालय के उस शांत कोने में, जहाँ पहाड़ बोलते नहीं- बस इतने विशाल होकर खड़े रहते हैं कि मनुष्य को अपनी आवाज धीमी करनी पड़ती है।
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